ज़ार निकोलाई द्वितीय: अंतिम रूसी सम्राट का इतिहास

प्रारंभिक जीवन और सिंहासनारूढ़ि

ज़ार निकोलाई द्वितीय का जन्म 18 मई 1868 को हुआ था। वे रोमानोव वंश के अंतिम सम्राट थे जिन्होंने 1894 में अपने पिता अलेक्ज़ेंडर तृतीय की मृत्यु के बाद सिंहासन संभाला। बचपन से ही उन्हें शाही अनुशासन और सैन्य शिक्षा मिली, लेकिन स्वभाव से वे सरल और भावुक माने जाते थे। सत्ता संभालने के समय वे साम्राज्य की राजनीतिक और सामाजिक जटिलताओं से जूझने के लिए पूरी तरह तैयार नहीं थे।

शासनकाल और चुनौतियाँ

निकोलाई द्वितीय के शासनकाल में रूस ने अनेक कठिनाइयों का सामना किया। 1905 की क्रांति ने उनकी सत्ता को हिलाकर रख दिया और उन्हें संवैधानिक सुधारों की घोषणा करनी पड़ी, जिसमें ड्यूमा (संसद) की स्थापना हुई। इसके बावजूद उनका शासन निरंकुश और कमजोर माना गया।

उनके शासन के दौरान रूस-जापान युद्ध (1904-1905) में पराजय ने जनता का विश्वास और भी कमज़ोर कर दिया। इसके बाद रूस में असंतोष और बढ़ गया।

परिवार और निजी जीवन

निकोलाई द्वितीय का विवाह अलेक्ज़ांड्रा फ्योदरोव्ना से हुआ था। उनके पाँच संतानें थीं, जिनमें सबसे प्रसिद्ध अनास्तासिया थीं। शाही परिवार धार्मिक आस्था और पारिवारिक जीवन के लिए जाना जाता था, लेकिन रासपुतिन नामक रहस्यमयी संत का उनके जीवन में प्रभाव विवाद का कारण बना।

प्रथम विश्व युद्ध और पतन

1914 में प्रथम विश्व युद्ध छिड़ने पर रूस ने मित्र राष्ट्रों के साथ भाग लिया। लेकिन युद्ध की असफलताएँ, आर्थिक संकट और जनता की बढ़ती पीड़ा ने ज़ार की लोकप्रियता को समाप्त कर दिया। युद्ध के दौरान उन्होंने स्वयं सेना की कमान संभाली, परंतु असफल रहे।

1917 की फरवरी क्रांति के बाद उन्हें सिंहासन छोड़ना पड़ा। इसके साथ ही तीन सौ साल पुराना रोमानोव साम्राज्य समाप्त हो गया।

गिरफ्तारी और दुखद अंत

सिंहासन छोड़ने के बाद शाही परिवार को कैद कर लिया गया। पहले उन्हें टोबोल्स्क और फिर येकातेरिनबर्ग ले जाया गया। जुलाई 1918 में बोल्शेविकों ने पूरे परिवार को गोली मारकर हत्या कर दी। यह घटना न केवल रूस बल्कि पूरे विश्व इतिहास का एक निर्णायक मोड़ बनी।

विरासत और स्मृति

ज़ार निकोलाई द्वितीय को 2000 में रूसी ऑर्थोडॉक्स चर्च ने संत का दर्जा दिया। आज भी उनके शासन और अंत को लेकर मिश्रित विचारधाराएँ हैं। कुछ लोग उन्हें एक धार्मिक और दयालु व्यक्ति मानते हैं, जबकि अन्य उन्हें अयोग्य शासक के रूप में देखते हैं।

उनकी विरासत रूस के इतिहास में राजशाही से लोकतंत्र और फिर सोवियत शासन की ओर संक्रमण का प्रतीक बनी।

निष्कर्ष

ज़ार निकोलाई द्वितीय का जीवन एक शाही वैभव, व्यक्तिगत संघर्ष, राजनीतिक असफलताओं और ऐतिहासिक त्रासदी का अद्वितीय मिश्रण है। उनकी कहानी यह दर्शाती है कि सत्ता का बोझ और समय की परिस्थितियाँ किस प्रकार एक साम्राज्य और शासक दोनों को प्रभावित कर सकती हैं।

Copied title and URL